Site icon

Ramman Festival:  उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के अनूठे प्रतीक रम्माण उत्सव का आज दिनांक 26-04-2026 को हुआ समापन्न

Ramman Festival

Ramman Festival

उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय की गोद में बसे चमोली जिले के सलोंर-डुंगरा गांवों में मनाया जाने वाला “रम्माण उत्सव” (Ramman Festival) भारत की

Ramman Festival

समृद्ध लोक-सांस्कृतिक परंपराओं का जीवंत उदाहरण है। यह केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि लोकनाट्य, संगीत, नृत्य और आस्था का अनूठा संगम है, जिसे वर्ष 2009 में यूनेस्को द्वारा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया।

हर वर्ष अप्रैल माह के अंत में आयोजित होने वाला यह उत्सव गांव के कुलदेवता भूमियाल देवता को समर्पित होता है। यह आयोजन बैसाखी के बाद शुरू होता है, जिसकी तिथि गांव के पुजारी द्वारा निर्धारित की जाती है। इस वर्ष रम्माण उत्सव का समापन्न दिनांक 26-04-2026 को हुआ है। जिसमें इस वर्ष भारी संख्या में देश-विदेश के श्रद्धालु एवं पर्यटक शामिल हुये।

रम्माण उत्सव (Ramman Festival) – में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ लोक कथाओं, रामायण के प्रसंगों और स्थानीय मान्यताओं का रंगारंग मंचन किया जाता है, जो इसे अन्य पारंपरिक मेलों से अलग पहचान देता है।

Ramman Festival

रम्माण की सबसे खास बात इसका सामुदायिक स्वरूप है। इस उत्सव में गांव का प्रत्येक वर्ग—बच्चे, युवा, बुजुर्ग, ब्राह्मण, और अन्य जातीय समूह—अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। ब्राह्मण पूजा-अर्चना का नेतृत्व करते हैं, जबकि विभिन्न समुदायों के लोग नृत्य, संगीत और अभिनय में भाग लेते हैं। विशेष रूप से भंडारी समुदाय के लोगों को नरसिंह अवतार का मुखौटा पहनने का अधिकार होता है, जो इस उत्सव की धार्मिक महत्ता को दर्शाता है।

यह उत्सव लगभग 10 से 13 दिनों तक चलता है, जिसमें प्रतिदिन अलग-अलग अनुष्ठान होते हैं। उत्सव की शुरुआत भगवान गणेश की वंदना से होती है, जिसके बाद गणेश, पार्वती, सूर्य देव, ब्रह्मा और अन्य देवी-देवताओं के जीवन प्रसंगों का मंचन किया जाता है। इन प्रस्तुतियों में लोक संगीत, ढोल-दमाऊं की थाप और पारंपरिक गीतों का विशेष महत्व होता है।

रम्माण उत्सव (Ramman Festival) का एक और आकर्षण इसके मुखौटे और नृत्य हैं। कलाकार विभिन्न देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों के मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं। ये मुखौटे विशेष प्रकार की लकड़ी से बनाए जाते हैं और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। एक विशेष परंपरा के तहत 18 कलाकार 18 अलग-अलग पात्रों का अभिनय करते हैं, जो 18 पुराणों और रामायण के प्रसंगों का प्रतीक माने जाते हैं।

Ramman Festival

इस उत्सव की जड़ें सैकड़ों वर्षों पुरानी हैं और यह पूरी तरह से मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहा है। बच्चे अपने बुजुर्गों को देखकर ही इस कला को सीखते हैं, जिससे यह परंपरा जीवित बनी हुई है। हालांकि, आधुनिकता, पलायन और तकनीकी बदलावों के कारण इस परंपरा के सामने चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं।

रम्माण उत्सव (Ramman Festival) केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह गढ़वाली समाज की सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक एकता और पर्यावरणीय दृष्टिकोण को भी दर्शाता है। इसमें स्थानीय जीवन, कृषि, प्रकृति और आस्था का गहरा संबंध देखने को मिलता है। यह उत्सव गांव के लोगों को एकजुट करता है और उनकी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रम्माण जैसे पारंपरिक उत्सव भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित करना बेहद आवश्यक है। इसके संरक्षण के लिए स्थानीय समुदाय के साथ-साथ सरकार

Ramman Festival

और सांस्कृतिक संस्थानों को भी प्रयास करने की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस अद्वितीय लोक परंपरा से जुड़ी रह सकें।

आज रम्माण उत्सव न केवल उत्तराखंड, बल्कि पूरे देश और दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है। यह उत्सव भारतीय लोक संस्कृति की विविधता और गहराई को दर्शाता है, जो हमारी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाता है।

 

 

click here to know about chardham yatra https://khabarnayi.com/%e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b0%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%ae-%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%a4%e0%a5%8d%e0%a4%b0%e0%a4%be-2026-chardham-yatra/

click here to know more about ramman https://ich.unesco.org/en/RL/ramman-religious-festival-and-ritual-theatre-of-the-garhwal-himalayas-india-00281

Exit mobile version